भारत में राष्ट्रवाद
Nationalism in India – सम्पूर्ण एवं आसान हिंदी नोट्स
📚 विषय-सूची
- राष्ट्रवाद का अर्थ
- भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण
- प्रारंभिक राष्ट्रीय आंदोलन
- गांधीजी का भारत आगमन और सत्याग्रह
- चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद आंदोलन
- प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
- रॉलेट एक्ट
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड
- खिलाफत आंदोलन
- असहयोग आंदोलन
- चौरी-चौरा घटना
- स्वराज पार्टी
- साइमन कमीशन
- पूर्ण स्वराज
- सविनय अवज्ञा आंदोलन
- दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह
- गांधी-इरविन समझौता
- विभिन्न वर्गों की भागीदारी
- भारत छोड़ो आंदोलन
- महत्वपूर्ण तिथियाँ
- महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
- Quick Revision
1. राष्ट्रवाद क्या है?
राष्ट्रवाद का सरल अर्थ है—अपने राष्ट्र के प्रति एकता, अपनापन और निष्ठा की भावना।
जब अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोग स्वयं को एक ही राष्ट्र का हिस्सा मानने लगते हैं, तब राष्ट्रीय चेतना विकसित होती है।
अपने देश के प्रति प्रेम, एकता और स्वतंत्रता की सामूहिक भावना को राष्ट्रवाद कहते हैं।
भारत में राष्ट्रवाद का विकास धीरे-धीरे हुआ।
ब्रिटिश शासन की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों के कारण भारतीयों में असंतोष बढ़ा।
समय के साथ यही असंतोष राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया।
2. भारत में राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारण
1. अंग्रेजों की आर्थिक नीतियाँ
ब्रिटिश शासन की अनेक नीतियों से भारतीय किसान, कारीगर और स्थानीय उद्योग प्रभावित हुए।
भारत से कच्चा माल बाहर भेजा जाता था और ब्रिटेन में बने सामान भारत में बेचे जाते थे।
इससे भारतीयों में औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष बढ़ा।
2. आधुनिक शिक्षा
आधुनिक शिक्षा के प्रसार से भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रवाद जैसे विचारों की जानकारी मिली।
3. समाचार-पत्र और साहित्य
अखबारों, पत्रिकाओं और साहित्य ने राजनीतिक विचारों को लोगों तक पहुँचाया।
इससे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को एक-दूसरे की समस्याओं की जानकारी मिलने लगी।
4. यातायात और संचार
रेलवे, डाक और तार जैसी सुविधाओं ने देश के विभिन्न भागों के बीच संपर्क बढ़ाया।
5. राजनीतिक संगठन
विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के विकास और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित मंच दिया।
3. प्रारंभिक राष्ट्रीय आंदोलन
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ था।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ही भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
शुरुआती वर्षों में कांग्रेस के नेता संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से भारतीयों के लिए अधिक राजनीतिक अधिकार चाहते थे।
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन
1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया।
इसके विरोध में व्यापक आंदोलन हुआ।
लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर जोर दिया।
स्वदेशी का अर्थ था—अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करना।
बहिष्कार का अर्थ था—विदेशी वस्तुओं को खरीदने और इस्तेमाल करने से इंकार करना।
होमरूल आंदोलन
बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने होमरूल आंदोलन को आगे बढ़ाया।
इस आंदोलन ने भारत में स्वशासन की माँग को अधिक मजबूत किया।
4. महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का प्रयोग कर चुके थे।
वे 1915 में भारत लौटे।
भारत आने के बाद उन्होंने देश की परिस्थितियों को समझा और स्थानीय समस्याओं से जुड़े आंदोलनों में भाग लेना शुरू किया।
सत्याग्रह क्या था?
गांधीजी का मानना था कि अन्याय का विरोध सत्य और अहिंसा के आधार पर किया जा सकता है।
सत्य और अहिंसा के आधार पर अन्याय का शांतिपूर्ण विरोध करने की पद्धति।
गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक जन आंदोलन बन गया।
5. गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलन
चंपारण सत्याग्रह – 1917
चंपारण बिहार में स्थित है।
यहाँ नील की खेती करने वाले किसान यूरोपीय बागान मालिकों की व्यवस्था से परेशान थे।
गांधीजी किसानों की समस्या जानने के लिए चंपारण पहुँचे।
उन्होंने किसानों की शिकायतों की जाँच की और शांतिपूर्ण संघर्ष किया।
अंततः किसानों को राहत दिलाने की दिशा में सुधार हुए।
चंपारण सत्याग्रह – 1917
स्थान – बिहार
मुख्य मुद्दा – नील की खेती से जुड़ी किसानों की समस्या
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन – 1918
अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच मजदूरी को लेकर विवाद हुआ।
गांधीजी ने मजदूरों की माँगों के समर्थन में शांतिपूर्ण संघर्ष किया।
इस आंदोलन ने मजदूरों के बीच गांधीजी के प्रभाव को बढ़ाया।
खेड़ा सत्याग्रह – 1918
गुजरात के खेड़ा जिले में फसल खराब होने से किसान परेशान थे।
किसानों के लिए लगान देना कठिन हो गया था।
इसके बावजूद सरकार लगान वसूलना चाहती थी।
गांधीजी और उनके सहयोगियों ने किसानों के समर्थन में आंदोलन किया।
चंपारण → नील किसान
अहमदाबाद → मिल मजदूर
खेड़ा → किसान और लगान
6. प्रथम विश्व युद्ध और भारत
प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक चला।
युद्ध के कारण ब्रिटिश सरकार का खर्च बहुत बढ़ गया।
इस खर्च को पूरा करने के लिए कर बढ़ाए गए और युद्ध ऋण लिया गया।
कई क्षेत्रों में सेना के लिए भर्ती का दबाव भी बढ़ा।
महँगाई बढ़ी और आम लोगों का जीवन कठिन हुआ।
युद्ध के अंतिम वर्षों और उसके बाद खाद्य संकट तथा महामारी ने भी जनता की कठिनाइयाँ बढ़ाईं।
इन परिस्थितियों से ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और बढ़ गया।
7. रॉलेट एक्ट – 1919
प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीयों को उम्मीद थी कि ब्रिटिश सरकार अधिक राजनीतिक अधिकार देगी।
लेकिन 1919 में सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया।
इस कानून ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण रखने और कुछ मामलों में बिना सामान्य मुकदमे की प्रक्रिया के लोगों को हिरासत में रखने की व्यापक शक्तियाँ दीं।
गांधीजी ने इस कानून का विरोध किया और देशव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया।
1919 का दमनकारी कानून, जिसने औपनिवेशिक सरकार को राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए विशेष शक्तियाँ दीं।
8. जलियाँवाला बाग हत्याकांड
यह घटना 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में हुई।
उस दिन बैसाखी का दिन था।
बड़ी संख्या में लोग जलियाँवाला बाग में एकत्र हुए थे।
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा।
उसने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
इस गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए।
इस घटना ने पूरे भारत में गहरा आक्रोश पैदा किया।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड – 13 अप्रैल 1919
स्थान – अमृतसर
जिम्मेदार अधिकारी – जनरल डायर
9. खिलाफत आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के उस्मानी सुल्तान और खलीफा की स्थिति कमजोर हो गई।
भारत के कई मुसलमान खलीफा के भविष्य को लेकर चिंतित थे।
इस मुद्दे को लेकर खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ।
भारत में मुहम्मद अली और शौकत अली इसके प्रमुख नेताओं में थे।
गांधीजी ने खिलाफत नेताओं के साथ सहयोग किया।
उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक हिंदू-मुस्लिम एकता के आधार पर संघर्ष को मजबूत करना था।
10. असहयोग आंदोलन – 1920
गांधीजी ने महसूस किया कि ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग के कारण ही चल पा रहा है।
यदि भारतीय शांतिपूर्ण ढंग से अपना सहयोग वापस ले लें, तो औपनिवेशिक शासन पर दबाव बनाया जा सकता है।
इसी विचार से असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
असहयोग का अर्थ
अन्यायपूर्ण शासन के साथ सहयोग न करना।
आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
- सरकारी उपाधियों और सम्मान का त्याग।
- सरकारी स्कूल और कॉलेजों का बहिष्कार।
- कानूनी और सरकारी संस्थाओं से दूरी।
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार।
- स्वदेशी और खादी का प्रचार।
आंदोलन का प्रसार
आंदोलन शहरों से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचा।
विद्यार्थी, शिक्षक, किसान, व्यापारी और अन्य सामाजिक समूह इसमें शामिल हुए।
लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों और समूहों के लिए “स्वराज” का अर्थ हमेशा एक जैसा नहीं था।
किसी के लिए स्वराज का अर्थ कम लगान था, तो किसी के लिए स्थानीय शोषण से मुक्ति।
11. चौरी-चौरा घटना और असहयोग आंदोलन की वापसी
फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शन हिंसक हो गया।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी।
इस घटना में पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।
गांधीजी अहिंसा के सिद्धांत पर दृढ़ थे।
उन्हें लगा कि आंदोलन हिंसक दिशा में जा रहा है।
इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया।
गांधीजी के लिए केवल लक्ष्य महत्वपूर्ण नहीं था।
लक्ष्य तक पहुँचने का साधन भी अहिंसक होना चाहिए था।
12. स्वराज पार्टी
असहयोग आंदोलन के समाप्त होने के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति को लेकर मतभेद सामने आए।
चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं ने विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार की नीतियों का भीतर से विरोध करने का विचार रखा।
इसी उद्देश्य से 1923 में स्वराज पार्टी की स्थापना हुई।
स्थापना – 1923
प्रमुख नेता – चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू
13. साइमन कमीशन का विरोध
ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया।
कमीशन 1928 में भारत पहुँचा।
इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
इस कारण भारत में इसका व्यापक विरोध हुआ।
प्रदर्शनकारियों ने नारा लगाया—“Simon Go Back”।
लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
14. पूर्ण स्वराज की माँग
1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ।
इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज अर्थात पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया।
निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा।
ब्रिटिश शासन से पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता।
15. सविनय अवज्ञा आंदोलन
पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में पहुँचा।
गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के सामने कई माँगें रखीं।
इनमें नमक कर समाप्त करना भी एक महत्वपूर्ण माँग थी।
सरकार द्वारा माँगें स्वीकार न किए जाने पर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाया।
अन्यायपूर्ण कानूनों का अहिंसक और खुला उल्लंघन करके उनका विरोध करना।
असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर
| असहयोग आंदोलन | सविनय अवज्ञा आंदोलन |
|---|---|
| सरकार के साथ सहयोग न करना | अन्यायपूर्ण कानूनों का अहिंसक उल्लंघन करना |
| सरकारी संस्थाओं और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार | नमक कानून सहित औपनिवेशिक कानूनों को चुनौती |
| मुख्य चरण 1920–22 | मुख्य चरण 1930 से |
16. दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह
गांधीजी ने नमक को आंदोलन का प्रतीक चुना।
नमक अमीर और गरीब—सभी की आवश्यकता थी।
इसलिए नमक पर सरकारी कर और नियंत्रण आम जनता से सीधे जुड़ा मुद्दा था।
गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा शुरू की।
वे अपने साथियों के साथ पैदल गुजरात के समुद्र तट की ओर चले।
6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने नमक कानून तोड़ा।
यह घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन का शक्तिशाली प्रतीक बन गई।
इसके बाद क्या हुआ?
- देश के कई भागों में नमक कानून तोड़ा गया।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ।
- शराब की दुकानों के सामने धरने दिए गए।
- कई स्थानों पर कर और औपनिवेशिक नियमों का विरोध हुआ।
- बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया।
शुरुआत – 12 मार्च 1930
स्थान – साबरमती आश्रम से दांडी
नमक कानून तोड़ा – 6 अप्रैल 1930
17. गांधी-इरविन समझौता – 1931
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दबाव के बीच गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच बातचीत हुई।
मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ।
गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
सरकार ने भी आंदोलन से संबंधित कुछ मामलों में रियायतें देने और हिंसा से संबंधित मामलों को छोड़कर कई राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर सहमति व्यक्त की।
गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए।
लेकिन सम्मेलन से भारतीय स्वतंत्रता के प्रश्न का संतोषजनक समाधान नहीं निकला।
भारत लौटने के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर शुरू हुआ, जिसे सरकार ने कठोर दमन से दबाने का प्रयास किया।
18. राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न वर्गों की भागीदारी
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल कुछ नेताओं का आंदोलन नहीं था।
समय के साथ समाज के विभिन्न वर्ग इससे जुड़े।
किसान
कई क्षेत्रों में किसान लगान में कमी और आर्थिक राहत चाहते थे।
उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को अपनी स्थानीय आर्थिक समस्याओं से जोड़कर देखा।
व्यापारी और उद्योगपति
भारतीय व्यापारिक वर्ग औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से कई बार असंतुष्ट था।
उसके एक हिस्से ने स्वदेशी उद्योगों की सुरक्षा और आर्थिक स्वायत्तता की माँग का समर्थन किया।
मजदूर
औद्योगिक मजदूरों ने भी विभिन्न स्थानों पर हड़तालों और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया।
उनकी माँगों में मजदूरी और काम की परिस्थितियाँ जैसे आर्थिक मुद्दे भी शामिल थे।
महिलाएँ
राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी।
उन्होंने जुलूसों, धरनों, विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और नमक सत्याग्रह जैसी गतिविधियों में भाग लिया।
सभी सामाजिक समूह राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए, लेकिन उनकी समस्याएँ और अपेक्षाएँ हमेशा एक जैसी नहीं थीं।
19. राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीक
राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक सभाओं तक सीमित नहीं था।
राष्ट्र की भावना को मजबूत करने के लिए प्रतीकों, गीतों, झंडों और ऐतिहासिक स्मृतियों का भी उपयोग हुआ।
भारत माता
भारत को “भारत माता” के रूप में प्रस्तुत करने से देश को एक मानवीय और भावनात्मक रूप मिला।
इससे लोगों में राष्ट्र के प्रति अपनापन बढ़ाने का प्रयास हुआ।
राष्ट्रीय ध्वज
राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न चरणों में अलग-अलग झंडों का प्रयोग हुआ।
झंडा राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
लोककथाएँ और इतिहास
भारतीय इतिहास, लोकगीतों और लोककथाओं के माध्यम से भी लोगों में अपने अतीत के प्रति गौरव की भावना जगाई गई।
20. भारत छोड़ो आंदोलन – 1942
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को भारतीय नेताओं की सहमति के बिना युद्ध में शामिल कर लिया।
इससे राजनीतिक तनाव बढ़ा।
1942 में क्रिप्स मिशन भी संवैधानिक समझौता कराने में सफल नहीं हुआ।
इसके बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन समाप्त करने की माँग तेज कर दी।
8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया।
गांधीजी ने प्रसिद्ध आह्वान दिया—“करो या मरो”।
अगले ही दिन गांधीजी सहित प्रमुख कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
इसके बावजूद देश के कई क्षेत्रों में आंदोलन फैल गया।
वर्ष – 1942
मुख्य माँग – ब्रिटिश शासन का अंत
गांधीजी का आह्वान – “करो या मरो”
21. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का महत्व
- राष्ट्रीय चेतना देश के व्यापक हिस्सों तक पहुँची।
- किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ और व्यापारी आंदोलन से जुड़े।
- ब्रिटिश शासन की वैधता को लगातार चुनौती मिली।
- स्वराज की माँग धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्रता की माँग में बदल गई।
- अहिंसा और सत्याग्रह राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण रणनीतियाँ बनीं।
- राष्ट्रीय आंदोलन ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को एक साझा राजनीतिक संघर्ष से जोड़ा।
- लंबे संघर्ष के बाद भारत ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की।
22. महत्वपूर्ण तिथियाँ
| वर्ष/तिथि | घटना |
|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना |
| 1905 | बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन |
| 1915 | महात्मा गांधी भारत लौटे |
| 1917 | चंपारण सत्याग्रह |
| 1918 | अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन और खेड़ा सत्याग्रह |
| 1919 | रॉलेट एक्ट |
| 13 अप्रैल 1919 | जलियाँवाला बाग हत्याकांड |
| 1920 | असहयोग आंदोलन का आरंभ |
| 1922 | चौरी-चौरा घटना और असहयोग आंदोलन की वापसी |
| 1923 | स्वराज पार्टी की स्थापना |
| 1928 | साइमन कमीशन का भारत आगमन और विरोध |
| 1929 | लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य |
| 26 जनवरी 1930 | स्वतंत्रता दिवस मनाया गया |
| 12 मार्च 1930 | दांडी यात्रा शुरू |
| 6 अप्रैल 1930 | दांडी में नमक कानून तोड़ा गया |
| 1931 | गांधी-इरविन समझौता |
| 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन |
| 15 अगस्त 1947 | भारत स्वतंत्र हुआ |
23. महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
| व्यक्ति | भूमिका |
|---|---|
| महात्मा गांधी | सत्याग्रह, असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे जन आंदोलनों के प्रमुख नेता |
| बाल गंगाधर तिलक | राष्ट्रवादी नेता और होमरूल आंदोलन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व |
| एनी बेसेंट | होमरूल आंदोलन की प्रमुख नेता |
| मुहम्मद अली एवं शौकत अली | खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता |
| चित्तरंजन दास | स्वराज पार्टी के प्रमुख संस्थापक नेताओं में से एक |
| मोतीलाल नेहरू | स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता |
| जवाहरलाल नेहरू | 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष |
| लाला लाजपत राय | साइमन कमीशन विरोध के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता |
24. परीक्षा के लिए VVI Points
- गांधीजी भारत लौटे – 1915
- चंपारण सत्याग्रह – 1917
- खेड़ा सत्याग्रह – 1918
- रॉलेट एक्ट – 1919
- जलियाँवाला बाग – 13 अप्रैल 1919
- असहयोग आंदोलन – 1920
- चौरी-चौरा – 1922
- स्वराज पार्टी – 1923
- साइमन कमीशन का भारत आगमन – 1928
- पूर्ण स्वराज – 1929 का लाहौर अधिवेशन
- दांडी यात्रा – 12 मार्च 1930
- नमक कानून तोड़ा – 6 अप्रैल 1930
- गांधी-इरविन समझौता – 1931
- भारत छोड़ो आंदोलन – 1942
25. महत्वपूर्ण लघु प्रश्न-उत्तर
26. दीर्घ उत्तरीय महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. असहयोग आंदोलन के कारण एवं कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1919 के रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा असंतोष पैदा किया।
इसी समय खिलाफत का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया था।
गांधीजी ने खिलाफत नेताओं के साथ सहयोग करके ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन बनाने का प्रयास किया।
1920 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
इसमें सरकारी उपाधियों का त्याग, सरकारी शिक्षण संस्थाओं और अन्य औपनिवेशिक संस्थाओं का बहिष्कार, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार तथा स्वदेशी और खादी को अपनाने पर जोर दिया गया।
आंदोलन में समाज के अनेक वर्गों ने भाग लिया।
1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों और महत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1928 में साइमन कमीशन के विरोध और ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय राजनीतिक माँगों को पर्याप्त महत्व न देने से असंतोष बढ़ा।
1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया।
गांधीजी ने सरकार के सामने कई माँगें रखीं, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।
इसके बाद 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा शुरू की।
6 अप्रैल को उन्होंने नमक कानून तोड़ा।
इसके साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन व्यापक रूप से फैल गया।
इस आंदोलन ने राष्ट्रीय संघर्ष को समाज के नए वर्गों तक पहुँचाया और ब्रिटिश सरकार को कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत करने के लिए प्रेरित किया।
प्रश्न 3. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जन आंदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख माध्यम बनाया।
1917 में चंपारण, 1918 में अहमदाबाद और खेड़ा के आंदोलनों से उन्होंने स्थानीय समस्याओं को उठाया।
इसके बाद रॉलेट सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व किया।
1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान “करो या मरो” का आह्वान किया।
उनके नेतृत्व में किसान, मजदूर, महिलाएँ, विद्यार्थी और अन्य सामाजिक समूह राष्ट्रीय आंदोलन से अधिक व्यापक रूप से जुड़े।
प्रश्न 4. भारत में राष्ट्रवाद के विकास में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भूमिका बताइए।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अलग-अलग सामाजिक वर्गों ने अलग-अलग कारणों से भाग लिया।
किसान लगान और आर्थिक कठिनाइयों से राहत चाहते थे।
मजदूर बेहतर मजदूरी और कार्य परिस्थितियों की अपेक्षा रखते थे।
भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों का एक हिस्सा ऐसी आर्थिक नीतियाँ चाहता था जो भारतीय व्यापार और उद्योग के लिए अधिक अनुकूल हों।
महिलाओं ने जुलूसों, धरनों, नमक सत्याग्रह और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में भाग लिया।
इन सभी की भागीदारी ने राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक किया।
27. Quick Revision – एक नजर में पूरा Chapter
एक लाइन में सबसे जरूरी बातें
चंपारण → नील किसानों की समस्या
खेड़ा → फसल खराब होने पर लगान का प्रश्न
अहमदाबाद → मिल मजदूरों की मजदूरी
रॉलेट एक्ट → दमनकारी कानून
असहयोग → अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग न करना
सविनय अवज्ञा → अन्यायपूर्ण कानून का अहिंसक उल्लंघन
दांडी मार्च → नमक कानून का विरोध
भारत छोड़ो → ब्रिटिश शासन समाप्त करने की माँग

