नाखून क्यों बढ़ते हैं
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
अध्याय 4 • ललित निबंध • गोधूलि भाग–2 • सम्पूर्ण नोट्स
पाठ परिचय
“नाखून क्यों बढ़ते हैं” एक विचारप्रधान ललित निबंध है। लेखक ने मनुष्य के नाखूनों जैसी साधारण दिखाई देने वाली चीज को आधार बनाकर मानव सभ्यता, संस्कृति और मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियों पर गंभीर विचार किया है।
नाखूनों का बार-बार बढ़ना लेखक को मनुष्य के पुराने पाशविक स्वभाव की याद दिलाता है, जबकि मनुष्य का उन्हें लगातार काटना उसके आत्म-संयम, सभ्यता और सांस्कृतिक विकास का संकेत बन जाता है।
लेखक परिचय – हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक, उपन्यासकार, साहित्येतिहासकार और विद्वान थे।
उनका जन्म 1907 ई. में बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके साहित्य में भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और मानवतावादी दृष्टिकोण का सुंदर समन्वय मिलता है।
उनकी प्रमुख रचनाओं में अशोक के फूल, कुटज, कल्पलता, विचार और विवेक, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, कबीर और सूर साहित्य आदि उल्लेखनीय हैं।
भारतीय संस्कृति की व्यापक समझ तथा सरल लेकिन विचारपूर्ण लेखन-शैली उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषता है।
पाठ का सरल सारांश
लेखक एक सामान्य प्रश्न से विचार शुरू करते हैं — नाखून आखिर क्यों बढ़ते हैं? मनुष्य उन्हें बार-बार काटता है, फिर भी वे दोबारा बढ़ जाते हैं।
यह छोटी-सी घटना लेखक को मानव सभ्यता के बहुत पुराने इतिहास की ओर ले जाती है। आदिम मनुष्य के पास आज जैसे विकसित हथियार और उपकरण नहीं थे। उस समय उसके नाखून आत्मरक्षा और संघर्ष में उपयोगी रहे होंगे।
समय के साथ मनुष्य ने पत्थर, धातु और अन्य पदार्थों से अनेक प्रकार के औजार तथा हथियार बनाए। परिणामस्वरूप शरीर के प्राकृतिक हथियार के रूप में नाखूनों की उपयोगिता कम होती गई।
लेकिन नाखूनों का बढ़ना बंद नहीं हुआ। लेखक इसे मनुष्य के भीतर बची हुई पुरानी पाशविक प्रवृत्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
मनुष्य नाखून बढ़ने देता ही नहीं। वह उन्हें बार-बार काटता है। यहीं लेखक को मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति का संकेत दिखाई देता है। मनुष्य अपनी आदिम हिंसक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने का निरंतर प्रयास करता है।
मनुष्य के भीतर दो प्रकार की प्रवृत्तियों का संघर्ष चलता रहता है। एक ओर हिंसा, क्रोध, संघर्ष और स्वार्थ जैसी पुरानी प्रवृत्तियाँ हैं; दूसरी ओर प्रेम, दया, संयम, त्याग और सहयोग जैसे मानवीय गुण हैं।
सभ्यता का विकास केवल नए उपकरण बना लेने में नहीं है। वास्तविक सभ्यता तब विकसित होती है जब मनुष्य अपने भीतर की हिंसक और पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करना सीखता है।
इसलिए नाखून काटने की सामान्य क्रिया लेखक के लिए मनुष्य की आत्म-संयम और सांस्कृतिक विकास की लंबी यात्रा का प्रतीक बन जाती है।
नाखून का प्रतीकात्मक अर्थ
बढ़ते नाखून
मनुष्य की पुरानी पाशविक और हिंसक प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
नाखून काटना
आत्म-संयम, सभ्यता और हिंसक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण का संकेत है।
आदिम मनुष्य
प्राकृतिक शक्तियों और शारीरिक साधनों पर अधिक निर्भर था।
सभ्य मनुष्य
विवेक, सहयोग और मानवीय मूल्यों को महत्व देने का प्रयास करता है।
नाखून काटना = आत्म-संयम और सभ्यता
पाठ के मुख्य बिंदु
01 नाखूनों का बढ़ना लेखक के लिए एक गंभीर सांस्कृतिक प्रश्न बन जाता है।
02 आदिम मनुष्य के लिए नाखून प्राकृतिक हथियार की तरह उपयोगी रहे होंगे।
03 मानव विकास के साथ मनुष्य ने अलग-अलग औजार और हथियार बनाए।
04 इससे नाखूनों की पुरानी उपयोगिता कम होती गई।
05 फिर भी नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियों की याद दिलाता है।
06 नाखून काटना मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।
07 मनुष्य के भीतर पशुता और मनुष्यता दोनों प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं।
08 सभ्यता का अर्थ केवल बाहरी विकास नहीं बल्कि आंतरिक संयम भी है।
09 प्रेम, दया, सहयोग और आत्म-संयम मानवीय संस्कृति के महत्वपूर्ण गुण हैं।
10 निबंध मानवता और सांस्कृतिक विकास की निरंतर यात्रा को प्रस्तुत करता है।
पशुता और मनुष्यता
सभ्यता और संस्कृति का अर्थ
लेखक की दृष्टि में सभ्यता केवल अच्छे कपड़े पहनना, आधुनिक साधनों का उपयोग करना या तकनीकी रूप से विकसित होना नहीं है।
मनुष्य का वास्तविक विकास तब दिखाई देता है जब वह अपने भीतर की हिंसक और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को नियंत्रित करता है।
प्रेम, दया, करुणा, संयम, सहयोग और त्याग जैसे गुण मनुष्य को वास्तविक अर्थ में सभ्य बनाते हैं।
निबंध का मुख्य संदेश
मनुष्य का इतिहास केवल बाहरी विकास का इतिहास नहीं है। यह उसके भीतर चल रहे पशुता और मनुष्यता के संघर्ष का इतिहास भी है।
आदिम प्रवृत्तियाँ मनुष्य में पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन मनुष्य का विवेक उसे बार-बार उन्हें नियंत्रित करने के लिए प्रेरित करता है।
इसी निरंतर प्रयास में मानव संस्कृति और सभ्यता का वास्तविक अर्थ छिपा है।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
लघु उत्तरीय प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ के लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।
प्रश्न 2. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ किस विधा की रचना है?
उत्तर: यह ललित निबंध है।
प्रश्न 3. नाखूनों का बढ़ना किस प्रवृत्ति का प्रतीक है?
उत्तर: नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम और पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है।
प्रश्न 4. नाखून काटना किस बात का प्रतीक है?
उत्तर: नाखून काटना मनुष्य के आत्म-संयम, सभ्यता और अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने की इच्छा का प्रतीक है।
प्रश्न 5. आदिम मनुष्य के लिए नाखून क्यों महत्वपूर्ण रहे होंगे?
उत्तर: विकसित औजार और हथियार न होने के कारण आदिम मनुष्य अपने नाखूनों का उपयोग आत्मरक्षा और संघर्ष में प्राकृतिक हथियार की तरह करता रहा होगा।
प्रश्न 6. नाखूनों की उपयोगिता क्यों कम हो गई?
उत्तर: मनुष्य ने पत्थर और धातु आदि से विभिन्न औजार तथा हथियार बना लिए। इसलिए प्राकृतिक हथियार के रूप में नाखूनों की उपयोगिता कम हो गई।
प्रश्न 7. लेखक मनुष्य को वास्तविक अर्थ में सभ्य कब मानते हैं?
उत्तर: जब मनुष्य अपनी हिंसक, स्वार्थी और पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखकर प्रेम, दया, सहयोग और संयम जैसे गुण अपनाता है, तब वह वास्तविक अर्थ में सभ्य बनता है।
प्रश्न 8. निबंध में मानव विकास का कौन-सा पक्ष प्रमुख है?
उत्तर: निबंध में मनुष्य के बाहरी विकास से अधिक उसके सांस्कृतिक, नैतिक और आंतरिक विकास पर बल दिया गया है।
प्रश्न 9. मनुष्य के भीतर किन दो प्रवृत्तियों का संघर्ष चलता है?
उत्तर: मनुष्य के भीतर पाशविक प्रवृत्ति और मानवीय-सांस्कृतिक प्रवृत्ति का संघर्ष चलता रहता है।
प्रश्न 10. पाठ हमें क्या शिक्षा देता है?
उत्तर: पाठ हमें अपनी हिंसक और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके प्रेम, संयम, सहयोग और मानवता को अपनाने की शिक्षा देता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबंध का सारांश लिखिए।
उत्तर: हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस निबंध में नाखूनों के बढ़ने जैसी सामान्य घटना को मानव सभ्यता के विकास से जोड़ा है। आदिम मनुष्य के लिए नाखून प्राकृतिक हथियार रहे होंगे। बाद में मनुष्य ने अनेक औजार और हथियार बना लिए, जिससे नाखूनों की वह उपयोगिता समाप्त होती गई।
फिर भी नाखून लगातार बढ़ते हैं। लेखक इसे मनुष्य में मौजूद पुरानी पाशविक प्रवृत्तियों की याद के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर मनुष्य उन्हें बार-बार काटता है। यह उसकी सभ्यता, संयम और पशुता से ऊपर उठने की इच्छा का प्रतीक है।
इस प्रकार लेखक बताते हैं कि मनुष्य के भीतर पशुता और मनुष्यता का संघर्ष निरंतर चलता रहता है। प्रेम, दया, त्याग, संयम और सहयोग के माध्यम से मनुष्य अपनी आदिम प्रवृत्तियों पर विजय पाने का प्रयास करता है।
प्रश्न 2. नाखूनों के माध्यम से लेखक ने मानव सभ्यता के विकास को कैसे समझाया है?
उत्तर: लेखक के अनुसार आदिम अवस्था में मनुष्य के नाखून उसके लिए प्राकृतिक हथियार की तरह उपयोगी थे। मानव सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने बाहरी औजार और हथियार बना लिए तथा नाखूनों की आवश्यकता कम हो गई।
इसके बावजूद उनका बढ़ना मनुष्य की आदिम प्रकृति का अवशेष है। मनुष्य का उन्हें काटना इस बात का संकेत है कि वह अपनी पाशविकता को स्वीकार करने के बजाय उसे नियंत्रित करना चाहता है।
इसलिए नाखूनों का बढ़ना और उन्हें काटना मानव इतिहास की दो दिशाओं — पशुता और संस्कृति — के प्रतीक बन जाते हैं।
प्रश्न 3. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शीर्षक देखने में एक सामान्य प्रश्न जैसा लगता है, लेकिन इसी प्रश्न के माध्यम से लेखक मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास पर गंभीर विचार करते हैं।
नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की पुरानी पाशविक प्रवृत्ति का प्रतीक है, जबकि उन्हें काटना उस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की सांस्कृतिक चेतना का संकेत है। पूरा निबंध इसी विचार के आसपास विकसित होता है। इसलिए ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्रश्न 4. लेखक की दृष्टि में वास्तविक मनुष्यता क्या है?
उत्तर: वास्तविक मनुष्यता केवल शारीरिक या तकनीकी विकास में नहीं है। मनुष्य की श्रेष्ठता उसके विवेक, प्रेम, दया, करुणा, त्याग, सहयोग और आत्म-संयम में है।
जब मनुष्य अपनी हिंसक और स्वार्थी प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर दूसरों के साथ सह-अस्तित्व और सहयोग का व्यवहार करता है, तभी उसकी वास्तविक मानवीय और सांस्कृतिक चेतना प्रकट होती है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न – MCQ
1. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ के लेखक कौन हैं?
A. रामविलास शर्मा
B. हजारी प्रसाद द्विवेदी
C. अमरकांत
D. गुणाकर मुले
2. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ किस विधा की रचना है?
A. कहानी
B. भाषण
C. ललित निबंध
D. साक्षात्कार
3. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म किस वर्ष हुआ?
A. 1907 ई.
B. 1891 ई.
C. 1911 ई.
D. 1923 ई.
4. नाखून किस पुरानी प्रवृत्ति की याद दिलाते हैं?
A. पाशविक प्रवृत्ति
B. व्यापारिक प्रवृत्ति
C. साहित्यिक प्रवृत्ति
D. वैज्ञानिक प्रवृत्ति
5. नाखून काटना किसका प्रतीक है?
A. आलस्य
B. सांस्कृतिक चेतना और संयम
C. क्रोध
D. भय
6. आदिम मनुष्य के लिए नाखून क्या थे?
A. आभूषण
B. प्राकृतिक हथियार
C. रोग
D. खेल
7. मनुष्य ने बाद में नाखूनों के स्थान पर क्या विकसित किए?
A. औजार और हथियार
B. केवल वस्त्र
C. केवल पुस्तकें
D. केवल भवन
8. निम्न में से कौन मानवीय प्रवृत्ति है?
A. हिंसा
B. क्रूरता
C. करुणा
D. आक्रमण
9. लेखक किस प्रकार के साहित्यकार हैं?
A. केवल कवि
B. निबंधकार एवं आलोचक
C. केवल नाटककार
D. केवल पत्रकार
10. मनुष्य की श्रेष्ठता मुख्यतः किसमें है?
A. केवल शारीरिक शक्ति में
B. विवेक और आत्म-संयम में
C. लंबे नाखूनों में
D. हथियारों में
11. ‘पाशविक’ का अर्थ है —
A. पशुओं जैसी प्रवृत्ति वाला
B. विद्वान
C. सभ्य
D. धार्मिक
12. निबंध का केंद्रीय विषय क्या है?
A. नाखूनों की चिकित्सा
B. मानव सभ्यता और सांस्कृतिक विकास
C. कृषि विकास
D. भाषा का इतिहास
13. ‘अशोक के फूल’ किसकी रचना है?
A. अमरकांत
B. हजारी प्रसाद द्विवेदी
C. मैक्समूलर
D. बिरजू महाराज
14. सभ्यता के लिए कौन-सा गुण महत्वपूर्ण है?
A. हिंसा
B. अहंकार
C. आत्म-संयम
D. आक्रमण
15. नाखूनों को बार-बार काटना किस दिशा की यात्रा का संकेत है?
A. पशुता से मनुष्यता की ओर
B. ज्ञान से अज्ञान की ओर
C. सभ्यता से जंगल की ओर
D. सहयोग से हिंसा की ओर
एक नजर में पूरा अध्याय
लेखक
हजारी प्रसाद द्विवेदी
विधा
ललित निबंध
मुख्य प्रतीक
नाखून
नाखून बढ़ना
पाशविक प्रवृत्ति
नाखून काटना
सभ्यता और संयम
मुख्य संघर्ष
पशुता बनाम मनुष्यता
मानवीय मूल्य
प्रेम, दया, सहयोग
मुख्य संदेश
आत्म-संयम और मानवता
परीक्षा के लिए याद रखें
इस पाठ में केवल यह लिखना पर्याप्त नहीं है कि नाखून बढ़ते हैं और मनुष्य उन्हें काटता है। इसके प्रतीकात्मक अर्थ को जरूर समझाएँ।
नाखून बढ़ना = पाशविक/आदिम प्रवृत्ति
नाखून काटना = मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना और आत्म-संयम
दीर्घ उत्तर में पशुता बनाम मनुष्यता, सभ्यता, संस्कृति, आत्म-संयम और मानवीय मूल्य जोड़ने से उत्तर पूर्ण होगा।

