श्रम विभाजन और जाति प्रथा Class 10 Hindi Notes

श्रम विभाजन और जाति प्रथा Class 10 Hindi Notes
Bihar Board • Class 10 • Hindi • गद्यखंड

श्रम विभाजन और जाति प्रथा

डॉ. भीमराव आंबेडकर

अध्याय 1 • गोधूलि भाग–2 • सम्पूर्ण नोट्स

BSEB EXAM GUIDE

पाठ परिचय

पाठश्रम विभाजन और जाति प्रथा
लेखकडॉ. भीमराव आंबेडकर
पुस्तकगोधूलि भाग–2
विधानिबंध

इस निबंध में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति-प्रथा और श्रम-विभाजन के बीच अंतर स्पष्ट किया है। लेखक बताते हैं कि समाज में कार्यों का विभाजन आवश्यक हो सकता है, लेकिन जन्म के आधार पर मनुष्य का पेशा निश्चित कर देना उचित श्रम-विभाजन नहीं है।

पाठ सामाजिक समानता, व्यक्ति की स्वतंत्रता, योग्यता, कार्यकुशलता और भाईचारे जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

लेखक परिचय – डॉ. भीमराव आंबेडकर

डॉ. भीमराव आंबेडकर

डॉ. भीमराव आंबेडकर भारत के प्रमुख विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, सामाजिक चिंतक और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था।

उन्होंने सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध व्यापक रूप से लेखन और सार्वजनिक कार्य किया। शिक्षा, समान अवसर और सामाजिक न्याय उनके चिंतन के महत्वपूर्ण विषय रहे।

वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री रहे और संविधान-निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

याद रखें: “श्रम विभाजन और जाति प्रथा” में लेखक जाति-आधारित पेशा-विभाजन की आलोचना करते हुए स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित समाज की आवश्यकता बताते हैं।

पाठ का सरल सारांश

डॉ. भीमराव आंबेडकर इस निबंध में जाति-प्रथा के समर्थन में दिए जाने वाले एक प्रमुख तर्क की समीक्षा करते हैं। कुछ लोग जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप मानते हैं।

लेखक मानते हैं कि किसी आधुनिक समाज में विभिन्न कार्यों का विभाजन स्वाभाविक और आवश्यक हो सकता है। लेकिन जाति-प्रथा केवल कामों का विभाजन नहीं करती; वह काम करने वाले मनुष्यों का भी विभाजन कर देती है।

जाति-आधारित व्यवस्था में व्यक्ति का पेशा उसकी व्यक्तिगत रुचि, योग्यता और क्षमता के आधार पर तय नहीं होता। वह जन्म के आधार पर पहले से निर्धारित माना जाता है। इससे व्यक्ति को अपनी पसंद और क्षमता के अनुसार काम चुनने की स्वतंत्रता नहीं मिलती।

लेखक के अनुसार आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियाँ समय के साथ बदलती रहती हैं। यदि किसी व्यक्ति को बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न मिले, तो वह रोजगार संबंधी कठिनाइयों का सामना कर सकता है। इस अर्थ में जाति-आधारित पेशागत बंधन आर्थिक प्रगति में भी बाधा बन सकता है।

जब किसी व्यक्ति को ऐसा कार्य करना पड़े जिसमें उसकी रुचि न हो, तो उसके काम में उत्साह और कार्यकुशलता प्रभावित हो सकती है। इसलिए लेखक योग्यता और रुचि के अनुसार कार्य चुनने की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण मानते हैं।

आंबेडकर ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जिसमें लोगों को समान अवसर प्राप्त हों, उनके बीच स्वतंत्र संपर्क हो और समाज में भाईचारा बना रहे। इस प्रकार पाठ स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

पाठ के मुख्य बिंदु

01 आधुनिक समाज में कार्यों का विभाजन आवश्यक हो सकता है।

02 जाति-प्रथा केवल श्रम नहीं, श्रमिकों को भी विभाजित करती है।

03 जाति के आधार पर पेशा जन्म से निर्धारित किया जाता है।

04 इसमें व्यक्ति की रुचि और योग्यता को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता।

05 पेशा बदलने की स्वतंत्रता सीमित होने से आर्थिक कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं।

06 अरुचिकर कार्य व्यक्ति की कार्यकुशलता को प्रभावित कर सकता है।

07 सामाजिक ऊँच-नीच समानता और एकता में बाधा डालती है।

08 आदर्श समाज में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा आवश्यक हैं।

श्रम विभाजन और जाति प्रथा में अंतर

श्रम विभाजन जाति-आधारित विभाजन
काम का विभाजन काम के साथ श्रमिकों का भी विभाजन
योग्यता एवं आवश्यकता के अनुसार बदल सकता है जन्म से पेशा निर्धारित करने की प्रवृत्ति
व्यक्ति को चुनाव की गुंजाइश व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित
कार्यकुशलता बढ़ाने का उद्देश्य ऊँच-नीच और सामाजिक दूरी को स्थायी कर सकता है

जाति-प्रथा की प्रमुख समस्याएँ

जन्म आधारित पेशा

व्यक्ति का कार्य उसकी रुचि के बजाय जन्म से जोड़ दिया जाता है।

पेशा चुनने की स्वतंत्रता

व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार दूसरा कार्य चुनने में बाधा अनुभव कर सकता है।

कार्यकुशलता

अरुचिकर कार्य को विवशता में करने से कार्य के प्रति उत्साह कम हो सकता है।

आर्थिक समस्या

बदलती आर्थिक परिस्थितियों में पेशा न बदल पाना रोजगार संबंधी समस्या पैदा कर सकता है।

सामाजिक असमानता

जातिगत ऊँच-नीच समाज में समानता की भावना को कमजोर करती है।

भाईचारे की कमी

समाज का कठोर विभाजन लोगों के बीच स्वतंत्र संपर्क और भ्रातृत्व को प्रभावित करता है।

आदर्श समाज की अवधारणा

डॉ. आंबेडकर के विचार में आदर्श समाज ऐसा होना चाहिए जिसमें विभिन्न समूहों के बीच स्वतंत्र संपर्क हो और लोगों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।

स्वतंत्रताव्यक्ति को चुनाव और विकास का अवसर
समानताजन्म के आधार पर ऊँच-नीच नहीं
भ्रातृत्वलोगों के बीच भाईचारा और सहयोग
स्वतंत्रता + समानता + भ्रातृत्व = आदर्श सामाजिक व्यवस्था

महत्वपूर्ण शब्दार्थ

विडंबनाविरोधाभासी या विचित्र स्थिति
श्रममेहनत अथवा कार्य
श्रम-विभाजनकार्यों का बँटवारा
पेशाजीविका का कार्य
कार्यकुशलताकाम को दक्षता से करने की क्षमता
स्वेच्छाअपनी इच्छा
समतासमानता
भ्रातृत्वभाईचारे की भावना
परिवर्तनशीलजो बदलता रहता हो
अवांछनीयजो वांछनीय न हो

लघु उत्तरीय प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. लेखक किस विडंबना की ओर संकेत करते हैं?

उत्तर: लेखक इस विडंबना की ओर संकेत करते हैं कि आधुनिक युग में भी जाति-प्रथा का समर्थन करने वाले लोग मौजूद हैं और उसे श्रम-विभाजन के आधार पर उचित सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 2. जाति-प्रथा को स्वाभाविक श्रम-विभाजन क्यों नहीं माना जा सकता?

उत्तर: क्योंकि जाति-प्रथा केवल कार्यों का विभाजन नहीं करती, बल्कि श्रमिकों को भी जन्म के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटती है। इसमें व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार पेशा चुनने की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।

प्रश्न 3. जाति-प्रथा व्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर: जाति-प्रथा व्यक्ति के पेशे को जन्म से जोड़ देती है। इससे वह अपनी रुचि, योग्यता और बदलती परिस्थितियों के अनुसार पेशा चुनने या बदलने में बाधा अनुभव करता है।

प्रश्न 4. जाति-प्रथा कार्यकुशलता में बाधक कैसे हो सकती है?

उत्तर: जब व्यक्ति को अपनी रुचि के विपरीत कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो उसमें उस काम के प्रति उत्साह कम हो सकता है। इससे उसकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है।

प्रश्न 5. जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण कैसे बन सकती है?

उत्तर: आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियाँ बदलने पर व्यक्ति को पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि जातिगत बंधन उसे दूसरा पेशा अपनाने से रोकें, तो उसके सामने बेरोजगारी या आजीविका का संकट उत्पन्न हो सकता है।

प्रश्न 6. लेखक के अनुसार आदर्श समाज की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: आदर्श समाज में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व होना चाहिए। लोगों के बीच स्वतंत्र संपर्क तथा सभी को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए।

प्रश्न 7. श्रम-विभाजन से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: समाज के विभिन्न कार्यों को लोगों की योग्यता, आवश्यकता और कार्यकुशलता के अनुसार बाँटना श्रम-विभाजन कहलाता है।

प्रश्न 8. जाति-प्रथा का आर्थिक पक्ष हानिकारक क्यों माना गया है?

उत्तर: क्योंकि यह व्यक्ति की पेशागत गतिशीलता को सीमित करती है। बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार पेशा न बदल पाने से व्यक्ति और समाज दोनों की आर्थिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. “जाति-प्रथा श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है।” स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सामान्य श्रम-विभाजन में समाज के अलग-अलग कार्यों को आवश्यकता, योग्यता और कार्यकुशलता के आधार पर बाँटा जाता है। इसमें व्यक्ति अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार कार्य चुन सकता है तथा परिस्थितियों के अनुसार उसे बदल भी सकता है।

इसके विपरीत जाति-प्रथा व्यक्ति के पेशे को उसके जन्म से जोड़ देती है। इसमें केवल कामों का बँटवारा नहीं होता, बल्कि काम करने वाले मनुष्यों को भी स्थायी समूहों में बाँट दिया जाता है। इस कारण व्यक्तिगत योग्यता, रुचि और स्वतंत्र चुनाव का महत्व कम हो जाता है। इसलिए लेखक जाति-प्रथा को स्वाभाविक श्रम-विभाजन न मानकर श्रमिकों का विभाजन मानते हैं।

प्रश्न 2. जाति-प्रथा के आर्थिक और सामाजिक दुष्परिणामों को समझाइए।

उत्तर: जाति-प्रथा व्यक्ति के पेशे को जन्म से निर्धारित करने की प्रवृत्ति रखती है। आर्थिक परिस्थितियाँ बदलने पर भी यदि व्यक्ति को पेशा बदलने की स्वतंत्रता न मिले तो बेरोजगारी और आजीविका संबंधी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। रुचि के विपरीत काम करने से कार्यकुशलता भी प्रभावित हो सकती है।

सामाजिक दृष्टि से जाति-प्रथा लोगों को ऊँच-नीच के समूहों में बाँटती है। इससे समानता, आपसी संपर्क और भाईचारे की भावना कमजोर होती है। इसलिए लेखक इसे सामाजिक तथा आर्थिक दोनों दृष्टियों से हानिकारक मानते हैं।

प्रश्न 3. डॉ. आंबेडकर की आदर्श समाज की कल्पना का वर्णन कीजिए।

उत्तर: डॉ. आंबेडकर ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जिसमें व्यक्ति को स्वतंत्रता और समान अवसर प्राप्त हों। लोगों को जन्म के आधार पर ऊँचा या नीचा न माना जाए और विभिन्न समूहों के बीच स्वतंत्र संपर्क बना रहे।

आदर्श समाज में सामाजिक संबंध भाईचारे पर आधारित हों तथा प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार आगे बढ़ सके। इस प्रकार स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व उनके आदर्श समाज के प्रमुख आधार हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न – MCQ

1. ‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ के लेखक कौन हैं?

A. हजारी प्रसाद द्विवेदी
B. डॉ. भीमराव आंबेडकर
C. रामविलास शर्मा
D. अमरकांत

उत्तर: B. डॉ. भीमराव आंबेडकर

2. यह पाठ किस विधा की रचना है?

A. कहानी
B. कविता
C. निबंध
D. नाटक

उत्तर: C. निबंध

3. डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म कब हुआ?

A. 14 अप्रैल 1891
B. 15 अगस्त 1890
C. 26 जनवरी 1892
D. 2 अक्टूबर 1891

उत्तर: A. 14 अप्रैल 1891

4. आधुनिक समाज में कार्यकुशलता के लिए क्या आवश्यक माना जाता है?

A. जाति-प्रथा
B. श्रम-विभाजन
C. बेरोजगारी
D. ऊँच-नीच

उत्तर: B. श्रम-विभाजन

5. जाति-प्रथा किसका भी विभाजन करती है?

A. केवल धन का
B. श्रमिकों का
C. केवल भूमि का
D. भाषा का

उत्तर: B. श्रमिकों का

6. जाति-आधारित पेशा मुख्यतः किससे जुड़ा होता है?

A. रुचि से
B. योग्यता से
C. जन्म से
D. परीक्षा से

उत्तर: C. जन्म से

7. आदर्श समाज का प्रमुख आधार क्या है?

A. ऊँच-नीच
B. अलगाव
C. समानता और भ्रातृत्व
D. जन्म-आधारित पेशा

उत्तर: C. समानता और भ्रातृत्व

8. व्यक्ति की रुचि के विपरीत कार्य किसे प्रभावित कर सकता है?

A. कार्यकुशलता
B. मौसम
C. भाषा
D. आयु

उत्तर: A. कार्यकुशलता

9. बदलती आर्थिक परिस्थितियों में व्यक्ति को किसकी आवश्यकता हो सकती है?

A. पेशा बदलने की
B. जाति बदलने की
C. भाषा बदलने की
D. देश बदलने की

उत्तर: A. पेशा बदलने की

10. ‘भ्रातृत्व’ का अर्थ है —

A. विरोध
B. भाईचारा
C. बेरोजगारी
D. श्रम

उत्तर: B. भाईचारा

11. ‘समता’ का अर्थ है —

A. असमानता
B. समानता
C. स्वतंत्रता
D. कार्य

उत्तर: B. समानता

12. जाति-प्रथा में व्यक्ति के किस पक्ष की उपेक्षा होती है?

A. रुचि एवं योग्यता
B. नाम
C. उम्र
D. भाषा

उत्तर: A. रुचि एवं योग्यता

एक नजर में पूरा अध्याय

01

लेखक
डॉ. भीमराव आंबेडकर

02

विधा
निबंध

03

मुख्य विषय
जाति-प्रथा की समीक्षा

04

श्रम-विभाजन
काम का बँटवारा

05

मुख्य समस्या
जन्म आधारित पेशा

06

आर्थिक प्रभाव
पेशागत गतिशीलता में बाधा

07

सामाजिक प्रभाव
असमानता एवं विभाजन

08

आदर्श
स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व

परीक्षा के लिए याद रखें

इस अध्याय में सबसे महत्वपूर्ण अंतर है — “श्रम-विभाजन” और “श्रमिकों के विभाजन” का। उत्तर लिखते समय स्पष्ट करें कि लेखक सामान्य श्रम-विभाजन का विरोध नहीं करते, बल्कि जन्म के आधार पर व्यक्ति और उसके पेशे को स्थायी रूप से बाँधने वाली व्यवस्था की आलोचना करते हैं।